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Friday, June 12, 2020

कोविड-19 (हेरा की कविता)



हेरा 10 वर्ष की है और 5वीं जमात में पढ़ती है। 

#कोरोना_कल_की_कवितायेँ



Wednesday, May 20, 2020

फिटनेस की जांच

बसें नहीं जाने दी।
1000 से कम थी शायद
कुछ बस नहीं स्कूल बस थीं।
कुछ के फिटनेस का मामला था शायद
कुछ चालकों के लाईसेंस भी हो गये होंगे पुराने
इसीलिए क़ायदे क़ानून की पक्की सरकार ने नहीं दी इजाज़त
कि चलें वो अन्फीट बसें।
अच्छा किया सरकार 
गिनती में कम, कागज़ों में कच्ची बसों को नहीं चलने दिया 
प्रदेश की सड़कों पर
लेकिन सरकार 
ये जो भूखे प्यासे मज़दूर 
नंगे पैर चले जा रहे हैं सड़कों पर
उनके सेहत की जांच तो कर ली होगी ना
आपके होनहार अफसरों ने
जांच ली होगी उनके पैरों की ताक़त
देख लिया होगा फिटनेस उन मासूम पैरों का
जो जल रहे हैं तपती सड़कों पर दिन रात घिसटते 
पीछे पीछे अपनी माँ के
देख ली होगी योग्यता हामला औरतों का कि वो चल सकतीं हैं मोलों मील पैदल 
ढ़ोती अपने पेट में पल रहे मासूम जान को
उन कमज़ोर लाचार बुढ़ी औरतों का कि उनके पैर नहीं छोड़ेंगे
उनका साथ उनकी ज़िन्दगी से पहले
ठीक से जांच करवा लेना सरकार 
क्यों कि कुछ नामुराद लोगों को शक़ है कि 
शहरों में काम करते हुए उन्होंने नहीं खाया है पुरा भोजन 
साल दर साल
क्योंकि, हां, कुछ हसद के मारे तो यहां तक कहते हैं कि 
कभी मिली नहीं इतनी मज़दूरी कि 
दे सकें वो अपने बच्चों को पुरा इलाज
इसिलिए अच्छा किया सरकार कि स्थगित कर दिया आपने 
कम से कम मज़दूरी का क़ानून 
अब शायद दे दें सेठ जी उनको भरपूर मज़दूरी
लेकिन वो तो खैर जब होगा तब होगा।
अभी तो ज़रूर देख लें सरकार आप 
उनकी फिटनेस 
देख ही लिया होगा सरकार आपने
किसी को हो ना हो 
हमें है पुरा यक़ीन 
वर्ना ऐसे कैसे चल रहे हैं वो पैदल आपके राज में
आपके राज पथों पर बिना करवाये फिटनेस की जांच।

नेसार अहमद 

#बसें
#मज़दूर
#लॉकडाउन
#lockdown
#MigrantsWorkers
 
#कोरोना_काल_की _कविताएं 

Saturday, May 16, 2020

झूट महिमा


झूट अन्तहीन, झूट अनंत
झूट ही राजा, झूटे मंत्री
झूटा सारा तंत्र
झूट बिना कब मोक्ष मिले
झूट से मिलता ये संसार
झूट कहो सम्मान पाओ
और पाओ दौलत अपार
झूटे हो तो जग में कहलाओगे
तुम सच्चे सेवक
जनता करेगी सम्मान आपका
लूटाएगी तन मन धन
और देगी अपना बहुमुल्य मत।
नेसार अहमद

#कोरोना_काल_की _कविताएं 

Wednesday, May 6, 2020

सड़कों पर ज़िन्दगी


सैकड़ों हज़ारों लोग
औरतें, बच्चे, जवान
फिर से निकल पड़े हैं, खुली सड़क पर
किसी महामारी, धुप, बारिश ओले
और पुलिस की मार की परवाह किये बग़ैर
मंज़िल बस एक है
पहुंचना है घर किसी तरह
यह भूक -
ये अजनबी शहर का अंजना बेपरवाह सन्नाटा
जिसे चुना था कभी हमने तलाश में रोज़ी के
वो इतना खौफनाक और बेपरवाह होगा
ये कब सोचा था हमने
निरकुंश, निर्दयी बेहिस सरकारें
जो हम से छीन लेना चाहती हैं
हमारा सब कुछ
डीज़ल, पेट्रोल, शराब
जीएसटी, वैट, आबकारी
और मंहगाई निचोड़ लेते हैं हमसे हमारी कमाई की एक एक पाई
और छोड़ देते हैं हमें
बेबस, लाचार, निहथे
बनाकर क्रूर औधोगिक मशीनों का चारा
और अब जब बंद है वो मशीन
तो इस शहर और तंत्र को नहीं है ज़रुरत
मिटाने की हमारी भूक
और हम छोड़ दिए गए हैं इन खुली सड़कों पर
चलने को मिलोंमील
पैदल, टूटी चप्पलों में
कंधे पर उठाये अपने बच्चे, बूढ़े मां-बाप
ये बीमारी कुछ करे न करे
यह हमें ज़रूर बताती है कि
हम हैं
ये शहर, ये तंत्र, ये सत्ता
इन सबके होने से नहीं
बल्कि इनके बावजूद
हम जीतेंगे ज़िन्दगी और भूक की ये जंग
आज नहीं तो कल
और तब रचेंगे एक नया संसार
नेसार अहमद
#कोरोना_काल_की _कविताएं
नोट: तस्वीरें इंटरनेट से


https://www.facebook.com/notes/nesar-ahmad/%E0%A4%B8%E0%A5%9C%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A5%9B%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%97%E0%A5%80/10222394456910859/

Thursday, February 27, 2020

क़ातिल को मसीहा लिखते रहो

तानाशाहों के यशोगान लिखने वाले कवियों 
अन्य धर्मों, जातियों, राष्ट्रों से विद्वेष रखने वाले लेखकों 
ज़हरीले भाषण देते राजनेताओं  
हत्यारी भीड़ में शामिल मासूम लोगों 

मैं जानता हूँ कि आज तुम्हारा है, और शायद कल भी तुम्हारा कुछ नहीं होना।

अनगिनत मासूमों की लाशें
दुःखी औरतों की चीखें 
बच्चों की बिलखती आवाज़ 
बुजुर्गों की ग़मज़दा सिसकियाँ 
ये सब तुम्हारे लिये तुम्हारे तुच्छ स्वार्थों से बहुत छोटे हैं ।

तुम अपने पुरस्कारों, पारितोषिकों, कुर्सियों, पदों, सुविधाओं 
और कुछ  नहीं तो 'अन्यों' को सबक़ सिखा देने 
के अपने चरम सुखों की लिप्सा में, 
ख़ुशी से अपना ज़मीर बेचते रहो।
रात को दिन
अंधेरे को उजाला 
स्याह को सफेद 
क़ातिल को मसीहा 
लिखते रहो
समझते रहो।

नेसार

Sunday, June 28, 2015

विकास एक अभिशाप है

विकास एक अभिशाप है 

विकास एक शापित शब्द है 
यह धो देता है एक हत्यारे के दामन के दाग़ तथा बना देता है उसे एक मसीहा 
विकास के जाप से एक हत्यारा गिरोह दिखने लगता है एक प्रगतिशील समूह 
जिसके हाथों लोग सौंप देते हैं अपना भविष्य 

विकास लूट लेता है ग़रीबों, किसानों, आदिवासियों की ज़मीन 
छीन लेता है उनसे उनके जंगल, पहाड़ और नदियाँ 
कर देता है उन्हें बेघर और विस्थापित 

शहरों में अंटी पड़ी प्रदुषण फैलाती गाड़ियों की भीड़, ऊँचे फलाई ओवर, चौड़ी होती सड़कें 
और ऊँचे से ऊँचे मॉल प्रतिक हैं विकास के 
ऊँचे और बड़े बांध, बड़े बड़े कारखाने, जंगलों को बर्बाद करते खदान 
ही वो जगह हैं जहाँ पैदा होता है विकास 
बर्बाद जंगल, ढहते पहाड़, गंद्लाती नदियाँ 
परिणाम हैं इस विकास का 

जीडीपी के आंकड़ों का मायाजाल, शेयर बाज़ार के सूचकांक का गिरना उतरना पैमाने हैं विकास के 
इसमें कहीं नहीं हैं हमारी और आपकी ज़िन्दगी से जुड़े सवाल 
इसमें नहीं है भूखे कमज़ोर बच्चों के होंटों की मुस्कान इसमें नहीं है ग़रीब कमज़ोर लाचार माओं के चेहरे की आशा – निराशा 
इसमें नहीं है बूढ़े बीमार पिताओं के इलाज का सामान 
इसमें नहीं है नौजवानों के रोज़गार के सवाल या लड़कियों की शिक्षा के उपाए 
हाँ, विकास बस एक अभिशाप है