देश के किसान बड़े पैमाने पर हुए बेमौसम बारिश तथा ओले की मार से बर्बाद हुए अपने खड़े फसलों के मारे बेटियों की शादियों के टल जाने तथा महाजन और बैंकों के कर्ज़ों को लौटा न पाने से होने वाले अपमान के डर से ख़ुदकुशी कर रहे थे, अपने बच्चों को स्कूलों से हटा रहे थे, अपनी बीमारियों के इलाज को मुल्तवी कर रहे थे I देश में किसानों तथा खेती के हालत दशकों से अंत्यंत नाजुक हैं तथा पिछले दो दशकों में हज़ारों किसानों ने ख़ुदकुशी किया है I लेकिन पिछले हफ्ते देश के अधिकतर हिस्सों में हुए बेमौसम बरसात तथा ओलावृष्टि ने जब उनके खेतों में खड़ी लगभग तैयार फसल रातों रात बर्बाद कर डाली तब तो जैसे उनकी कमर ही टूट गयी I प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि महाराष्ट्र से ऊपर लगभग सभी राज्यों में फसलों की भारी बर्बादी हुई है I
वहीँ मोदी सरकार भी 2013 में मनमोहन सरकार द्वारा संसद में पारित नए भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून को पूरी तरह से पंगु बना देने के उद्देश्य से लाये एक अध्यादेश, जिसे मीडिया आम तौर पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा सुधारवादी क़दम बताता है, को विधेयक के रूप में लोकसभा में पारित करवाने के बाद, इसे राज्यसभा में पारित करवा कर उद्योगपतियों, देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा विदेशी निवेशकों की नज़र में खुले बाज़ार तथा उद्योग धंधों के सबसे बड़े समर्थक सरकार की अपनी छवि को पुख्ता कर लेना चाहती थी I लेकिन उनकी मुश्किल यह थी (और है) कि राज्यसभा में उनकी पार्टी अल्पमत में है तथा सभी विपक्षी दल इस विधेयक को किसान विरोधी बताते हुए एकजूट हो गए हैं I
ऐसे में जब मोदी जी ने किसानों से उनकी संकट की इस घड़ी में 'मन की बात' में उन्होंने किसानों के सर आ पड़ी इस आफत की बात शुरू करी ज़रूर लेकिन जल्दी ही वो किसानों से अपनी सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल, भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून में संशोधन विधेयक को विपक्ष द्वारा पारित नहीं होने दिए जाने, का रोना ले कर बैठ गए I ज़ाहिर है इस कार्यक्रम का नाम "मन की बात" है, तथा मोदी जी ने अपने मन की बात, या कहीये, भड़ास किसानों को सुना डाली I
अब इसका तो सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि दुखी किसान भाइयों बहनों को प्रधान मंत्री के चिंतित मन की बात सुन कर कैसा लगा I देश के करोड़ों छोटे और मंझोले किसानों ने "बहुत हुआ किसानों पे अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार" के नारे पर भाजपा को अपना मत दिया था और प्रधान मंत्री ने जब उनसे "मन की बात" की तो उन्हें यह समझाने लगे कि बिना उनकी (किसानों की) सहमती के उनकी ज़मीनें लेकर बड़े उद्योगपतियों को देना क्यों ज़रूरी है I
चुनाव से पूर्व उनकी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि उनकी सरकार आई तो किसानों को खेती पर होने वाले लागत खर्च का कम से कम आधा मुनाफा दिलाना सुनिश्चित किया जायेगा I
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया था कि वो सत्ता में आई तो कृषि और ग्रामीण विकास में सरकारी निवेश बढाया जायेगा I लेकिन इस वर्ष ही बजट में मोदी सरकार ने कृषि मंत्रालय को आवंटित कुल बजट में पिछले वर्ष के मुकाबले 2848 करोड़ रुपये की कटौती की है I ज़ाहिर है मोदी जी किसानों से 'मन की बात' में अपने इस वादाखिलाफ़ी की बात तो करते नहीं तो किसानों को उनके लागत खर्च से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिलाने के उपायों की चर्चा करने के बजाये मोदी जी उन्हें ये बताने लगे कि 2013 के कानून की सबसे बड़ी कमी क्या है I और आदतन मोदी जी ने यहाँ भी आधे सच का सहारा लिया I
मोदी जी ने 'मन की बात' में किसानों को कहा कि 2013 का कानून आनन फानन में लाया गया था I जबकि सच यह है कि इस कानून को वर्षों के विचार विमर्श के बाद लाया गया था I भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून 2013 का पहला मसौदा 2011 में आया था जिस पर ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति, जिसकी अध्यक्ष लोकसभा की वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन थीं, ने काफी गहन विमर्श किया था I लेकिन युपीए के पहले शासन काल में भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन के लिए दो अलग अलग विधेयक आये थे तथा लोक सभा में पारित हुए थे लेकिन राज्य सभा में पारित नहीं हो सके थे I ज़ाहिर है कि इस विषय पर कानून बनाने कि कवायद लंबे समय से चल रही थी I
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि 2013 के कानून में 13 ऐसे कानून, जिनके तहत भूमि अधिग्रहण की जा सकती है, को यह छूट है कि उनके अधीन होने वाले भूमि अधिग्रहण में पुराने मुआवज़े को जारी रखा जाये I अब यह आधा भी नहीं पूरा झूठ है I यह सच है कि 2013 का कानून 13 केंद्रीय कानूनों के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण कि स्थिति में कई छूट देता है, जैसे सामाजिक प्रभाव आंकलन तथा निजी एवं निजी-सार्वजनिक भागीदारी के लिए लिए जाने वाली ज़मीन के लिए क्रमशः 70 तथा 80 प्रतिशत प्रभावितों की आवश्यक सहमती, अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार आदि I लेकिन ये छूट मुआवजा और पुनर्वास और पुनार्वासन के मामले में नहीं था I इन 13 कानूनों पर भी 2013 के कानून के मुआवजा और पुनर्वास और पुनार्वासन संबंधित प्रावधान लागु होने थे, जिसके लिए सरकार को एक 2013 के कानून के लागू होने के एक साल के अन्दर आदेश (अधिसूचना) निकलना था I हाँ यह आदेश निकलने की ज़िम्मेदारी ज़रूर मोदी सरकार की थी, क्योंकि 1 जनवरी 2014 से नया कानून लागु हुआ और मई 2014 में देश की जनता ने मोदी जी को अपना प्रधानमंत्री चुन लिया था I
लेकिन मोदी सरकार ने जो अध्यादेश तथा अब विधेयक 2013 के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून में परिवर्तन के लिया लाया उसने न केवल उन 13 कानूनों के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण के मामले में 2013 के कानून के विशेष प्रावधानों के छूट को जारी रखा बल्कि 5 और प्रकार कि परियोजनाओं के मामले में होने वाले भूमि अधिग्रहण में भी यह छूट बढ़ाने का प्रावधान कर दिया I इसके अलावा 'कम्पनी' शब्द की जगह 'निजी इकाई' शब्द ला दिया जिससे निजी क्षेत्र जिनके लिए भूमि अधिग्रहण हो सकता था उसका दायरा और बढ़ गया I इसके अलावा भी इस विधेयक में किसानों के हितों के विरुद्ध और निजी क्षेत्रों के हित में कई प्रावधान हैं जिन्हें यहाँ और यहाँ पढ़ा जा सकता है I
लेकिन इस पुरे खेल में सबसे मज़ेदार बात यह है कि 2013 के कानून की जो भी कमियां रही हों उसका पता मोदी जी को तब नहीं चला जब उन्की पार्टी ने संसद में उस कानून का समर्थन किया थाI उसके पहले तब भी नहीं जब उनकी पार्टी की एक वरिष्ठ सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता में ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय समिति उस कानून के बनने के पूर्व उसके मसौदे पर विचार कर रही थी, जिस में भाजपा सहित सभी दलों के सांसद थे I इस समिति ने काफी बड़े स्तर पर विचार विमर्श किया था जिसमें भाजपा शासित राज्यों सहित कई राज्य सरकारों ने भी अपने पक्ष रखे थे I यही नहीं उस संसदीय समिति में औद्योगिक संगठनों ने भी अपने पक्ष रखे थे I
मोदी जी को 2013 के कानून की कमियों का पता तब भी नहीं चला जब वो लोकसभा चुनावों के पूर्व अडानी के जहाज़ में घूम घूम कर महीनों अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे थे I मुझे नहीं याद आता कि तब उन्होंने एक बार भी 2013 के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून की आलोचना करी हो I
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| प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के दौरान |
लेकिन मज़ेदार यह है कि सभी दलों के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून 2013 के विरोध में होने का दावा करने के बावजूद मोदी सरकार ने इस कानून के संशोधनों को संसद की पटल पर रखने के बजाये अध्यादेश के रूप में लाना ज़रूरी समझा I अब इस अध्यादेश को कानून बनाने की क़वायद जारी है और विपक्षी दलों ने मोदी सरकार, जो मित्र से ज़यादा दुश्मन बनाने में यकीन रखती है, को घेरने के लिए और देश के किसानों के मिजाज़ को भांपते हुए अपने सुर बदल लिए हैं और राज्य सभा में इस किसान विरोधी विधेयक को पारित नहीं होने देने के लिए सोनिया गाँधी को अपना नेता मान लिया है I
ज़ाहिर है कि यदि रजनीति परसेप्शन का खेल है तो मोदी सरकार इस खेल में पिछड़ रही है तथा आज़ादी के 66 वर्षों में सर्वाधिक वर्ष राज करने वाली कांग्रेस, जिसने अपने शासन काल में अंग्रेजों के बनाये भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 का बिना झिझक न सिर्फ उपयोग किया बल्कि दुरूपयोग भी किया, को आज अपने आपको को किसान समर्थक बताने का मौका मिल गया है I यही नहीं उनके इस भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध न केवल विपक्षी दल और किसान संगठन कर रहे हैं बल्कि उनकी पार्टी भाजपा के अन्दर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं I लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कोई और नहीं केवल मोदी जी ही हैं I
कैसा लगा होगा किसानों को मोदी जी के 'मन की बात' सुनकर ! उन्हें शायद ये समझ ही नहीं आ रहा हो कि ये कैसा प्रधान मंत्री है और किसके मन कि बात कर रहा हैI कोई प्रधान मंत्री किसानों से उनके सबसे बड़े संकट के समय में उन्हें यह समझाने कि कोशिश कैसे कर सकता है कि उनकी ज़मीन उनसे बिना मर्ज़ी के छीन लेना क्यों ज़रूरी है I प्रधान मंत्री वास्तव में उनसे किसके मन बात कर रहे थे I अपनी या किसानों की या उन उद्योगपतियों की जो सरकार से टैक्स और ज़मीन सहित कई तरह की छूट लेते हैं, देश के सभी बैंकों से करोड़ों का क़र्ज़ लेकर वापिस नहीं देते और उनके माथे पर बल भी नहीं आता I जो किसान इतना सवेंदनशील है कि क़र्ज़ वापस नहीं करने की स्थिति में होने वाली बदनामी और अपमान की सोच कर आत्महत्या कर लेता है उस किसान से प्रधान मंत्री उन उद्योगपतियों को ज़मीन देने की बात कर रहे हैं जिन्होंने सेज़ और अन्य परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ ज़मीन ले रखी है, उन्हें खाली रख छोड़ा है, या उनका किसी और उद्देश्य के लिए उपयोग किया है I
किसान वैसे ही सालों साल अपनी खेती की ज़मीन गवां रहा है और अपनी ही ज़मीनों पर मजदूर बन जाने को विवश हो रहा है I एक सरकारी समिति के आंकलन के अनुसार देश में 1990 से 2003 के दौरान 21 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि ग़ैर कृषि कार्यों में लग गयी है I ऐसे में उद्योगों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के पास पड़े खाली ज़मीनों का पता लगा कर उनका पुनः उपयोग करने, परती और बंजर पड़ी सरकारी ज़मीनों की पहचान करने और रेलवे तथा अन्य सरकारी महकमों की लाखों एकड़ ज़मीनों का उपयोग करने के बजाये मोदी सरकार किसानों की ज़मीन आसानी से उद्योगपतियों को देने के लिए कानून ला रही है और किसानों को मोदी जी 'मन की बात' में यह समझाने में लगे हैं कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है I

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