Thursday, December 14, 2023
State of Food Security and Nutrition report by FAO: A discussion on India's food and nutrition security
Sunday, June 28, 2015
विकास एक अभिशाप है
Monday, March 23, 2015
बर्बाद किसान और 'मन की बात' में मगन सरकार
देश के किसान बड़े पैमाने पर हुए बेमौसम बारिश तथा ओले की मार से बर्बाद हुए अपने खड़े फसलों के मारे बेटियों की शादियों के टल जाने तथा महाजन और बैंकों के कर्ज़ों को लौटा न पाने से होने वाले अपमान के डर से ख़ुदकुशी कर रहे थे, अपने बच्चों को स्कूलों से हटा रहे थे, अपनी बीमारियों के इलाज को मुल्तवी कर रहे थे I देश में किसानों तथा खेती के हालत दशकों से अंत्यंत नाजुक हैं तथा पिछले दो दशकों में हज़ारों किसानों ने ख़ुदकुशी किया है I लेकिन पिछले हफ्ते देश के अधिकतर हिस्सों में हुए बेमौसम बरसात तथा ओलावृष्टि ने जब उनके खेतों में खड़ी लगभग तैयार फसल रातों रात बर्बाद कर डाली तब तो जैसे उनकी कमर ही टूट गयी I प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि महाराष्ट्र से ऊपर लगभग सभी राज्यों में फसलों की भारी बर्बादी हुई है I
वहीँ मोदी सरकार भी 2013 में मनमोहन सरकार द्वारा संसद में पारित नए भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून को पूरी तरह से पंगु बना देने के उद्देश्य से लाये एक अध्यादेश, जिसे मीडिया आम तौर पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा सुधारवादी क़दम बताता है, को विधेयक के रूप में लोकसभा में पारित करवाने के बाद, इसे राज्यसभा में पारित करवा कर उद्योगपतियों, देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा विदेशी निवेशकों की नज़र में खुले बाज़ार तथा उद्योग धंधों के सबसे बड़े समर्थक सरकार की अपनी छवि को पुख्ता कर लेना चाहती थी I लेकिन उनकी मुश्किल यह थी (और है) कि राज्यसभा में उनकी पार्टी अल्पमत में है तथा सभी विपक्षी दल इस विधेयक को किसान विरोधी बताते हुए एकजूट हो गए हैं I
ऐसे में जब मोदी जी ने किसानों से उनकी संकट की इस घड़ी में 'मन की बात' में उन्होंने किसानों के सर आ पड़ी इस आफत की बात शुरू करी ज़रूर लेकिन जल्दी ही वो किसानों से अपनी सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल, भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून में संशोधन विधेयक को विपक्ष द्वारा पारित नहीं होने दिए जाने, का रोना ले कर बैठ गए I ज़ाहिर है इस कार्यक्रम का नाम "मन की बात" है, तथा मोदी जी ने अपने मन की बात, या कहीये, भड़ास किसानों को सुना डाली I
अब इसका तो सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि दुखी किसान भाइयों बहनों को प्रधान मंत्री के चिंतित मन की बात सुन कर कैसा लगा I देश के करोड़ों छोटे और मंझोले किसानों ने "बहुत हुआ किसानों पे अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार" के नारे पर भाजपा को अपना मत दिया था और प्रधान मंत्री ने जब उनसे "मन की बात" की तो उन्हें यह समझाने लगे कि बिना उनकी (किसानों की) सहमती के उनकी ज़मीनें लेकर बड़े उद्योगपतियों को देना क्यों ज़रूरी है I
चुनाव से पूर्व उनकी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि उनकी सरकार आई तो किसानों को खेती पर होने वाले लागत खर्च का कम से कम आधा मुनाफा दिलाना सुनिश्चित किया जायेगा I
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया था कि वो सत्ता में आई तो कृषि और ग्रामीण विकास में सरकारी निवेश बढाया जायेगा I लेकिन इस वर्ष ही बजट में मोदी सरकार ने कृषि मंत्रालय को आवंटित कुल बजट में पिछले वर्ष के मुकाबले 2848 करोड़ रुपये की कटौती की है I ज़ाहिर है मोदी जी किसानों से 'मन की बात' में अपने इस वादाखिलाफ़ी की बात तो करते नहीं तो किसानों को उनके लागत खर्च से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिलाने के उपायों की चर्चा करने के बजाये मोदी जी उन्हें ये बताने लगे कि 2013 के कानून की सबसे बड़ी कमी क्या है I और आदतन मोदी जी ने यहाँ भी आधे सच का सहारा लिया I
मोदी जी ने 'मन की बात' में किसानों को कहा कि 2013 का कानून आनन फानन में लाया गया था I जबकि सच यह है कि इस कानून को वर्षों के विचार विमर्श के बाद लाया गया था I भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून 2013 का पहला मसौदा 2011 में आया था जिस पर ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति, जिसकी अध्यक्ष लोकसभा की वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन थीं, ने काफी गहन विमर्श किया था I लेकिन युपीए के पहले शासन काल में भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन के लिए दो अलग अलग विधेयक आये थे तथा लोक सभा में पारित हुए थे लेकिन राज्य सभा में पारित नहीं हो सके थे I ज़ाहिर है कि इस विषय पर कानून बनाने कि कवायद लंबे समय से चल रही थी I
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि 2013 के कानून में 13 ऐसे कानून, जिनके तहत भूमि अधिग्रहण की जा सकती है, को यह छूट है कि उनके अधीन होने वाले भूमि अधिग्रहण में पुराने मुआवज़े को जारी रखा जाये I अब यह आधा भी नहीं पूरा झूठ है I यह सच है कि 2013 का कानून 13 केंद्रीय कानूनों के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण कि स्थिति में कई छूट देता है, जैसे सामाजिक प्रभाव आंकलन तथा निजी एवं निजी-सार्वजनिक भागीदारी के लिए लिए जाने वाली ज़मीन के लिए क्रमशः 70 तथा 80 प्रतिशत प्रभावितों की आवश्यक सहमती, अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार आदि I लेकिन ये छूट मुआवजा और पुनर्वास और पुनार्वासन के मामले में नहीं था I इन 13 कानूनों पर भी 2013 के कानून के मुआवजा और पुनर्वास और पुनार्वासन संबंधित प्रावधान लागु होने थे, जिसके लिए सरकार को एक 2013 के कानून के लागू होने के एक साल के अन्दर आदेश (अधिसूचना) निकलना था I हाँ यह आदेश निकलने की ज़िम्मेदारी ज़रूर मोदी सरकार की थी, क्योंकि 1 जनवरी 2014 से नया कानून लागु हुआ और मई 2014 में देश की जनता ने मोदी जी को अपना प्रधानमंत्री चुन लिया था I
लेकिन मोदी सरकार ने जो अध्यादेश तथा अब विधेयक 2013 के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून में परिवर्तन के लिया लाया उसने न केवल उन 13 कानूनों के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण के मामले में 2013 के कानून के विशेष प्रावधानों के छूट को जारी रखा बल्कि 5 और प्रकार कि परियोजनाओं के मामले में होने वाले भूमि अधिग्रहण में भी यह छूट बढ़ाने का प्रावधान कर दिया I इसके अलावा 'कम्पनी' शब्द की जगह 'निजी इकाई' शब्द ला दिया जिससे निजी क्षेत्र जिनके लिए भूमि अधिग्रहण हो सकता था उसका दायरा और बढ़ गया I इसके अलावा भी इस विधेयक में किसानों के हितों के विरुद्ध और निजी क्षेत्रों के हित में कई प्रावधान हैं जिन्हें यहाँ और यहाँ पढ़ा जा सकता है I
लेकिन इस पुरे खेल में सबसे मज़ेदार बात यह है कि 2013 के कानून की जो भी कमियां रही हों उसका पता मोदी जी को तब नहीं चला जब उन्की पार्टी ने संसद में उस कानून का समर्थन किया थाI उसके पहले तब भी नहीं जब उनकी पार्टी की एक वरिष्ठ सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता में ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय समिति उस कानून के बनने के पूर्व उसके मसौदे पर विचार कर रही थी, जिस में भाजपा सहित सभी दलों के सांसद थे I इस समिति ने काफी बड़े स्तर पर विचार विमर्श किया था जिसमें भाजपा शासित राज्यों सहित कई राज्य सरकारों ने भी अपने पक्ष रखे थे I यही नहीं उस संसदीय समिति में औद्योगिक संगठनों ने भी अपने पक्ष रखे थे I
मोदी जी को 2013 के कानून की कमियों का पता तब भी नहीं चला जब वो लोकसभा चुनावों के पूर्व अडानी के जहाज़ में घूम घूम कर महीनों अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे थे I मुझे नहीं याद आता कि तब उन्होंने एक बार भी 2013 के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून की आलोचना करी हो I
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| प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के दौरान |
लेकिन मज़ेदार यह है कि सभी दलों के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून 2013 के विरोध में होने का दावा करने के बावजूद मोदी सरकार ने इस कानून के संशोधनों को संसद की पटल पर रखने के बजाये अध्यादेश के रूप में लाना ज़रूरी समझा I अब इस अध्यादेश को कानून बनाने की क़वायद जारी है और विपक्षी दलों ने मोदी सरकार, जो मित्र से ज़यादा दुश्मन बनाने में यकीन रखती है, को घेरने के लिए और देश के किसानों के मिजाज़ को भांपते हुए अपने सुर बदल लिए हैं और राज्य सभा में इस किसान विरोधी विधेयक को पारित नहीं होने देने के लिए सोनिया गाँधी को अपना नेता मान लिया है I
ज़ाहिर है कि यदि रजनीति परसेप्शन का खेल है तो मोदी सरकार इस खेल में पिछड़ रही है तथा आज़ादी के 66 वर्षों में सर्वाधिक वर्ष राज करने वाली कांग्रेस, जिसने अपने शासन काल में अंग्रेजों के बनाये भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 का बिना झिझक न सिर्फ उपयोग किया बल्कि दुरूपयोग भी किया, को आज अपने आपको को किसान समर्थक बताने का मौका मिल गया है I यही नहीं उनके इस भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध न केवल विपक्षी दल और किसान संगठन कर रहे हैं बल्कि उनकी पार्टी भाजपा के अन्दर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं I लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कोई और नहीं केवल मोदी जी ही हैं I
कैसा लगा होगा किसानों को मोदी जी के 'मन की बात' सुनकर ! उन्हें शायद ये समझ ही नहीं आ रहा हो कि ये कैसा प्रधान मंत्री है और किसके मन कि बात कर रहा हैI कोई प्रधान मंत्री किसानों से उनके सबसे बड़े संकट के समय में उन्हें यह समझाने कि कोशिश कैसे कर सकता है कि उनकी ज़मीन उनसे बिना मर्ज़ी के छीन लेना क्यों ज़रूरी है I प्रधान मंत्री वास्तव में उनसे किसके मन बात कर रहे थे I अपनी या किसानों की या उन उद्योगपतियों की जो सरकार से टैक्स और ज़मीन सहित कई तरह की छूट लेते हैं, देश के सभी बैंकों से करोड़ों का क़र्ज़ लेकर वापिस नहीं देते और उनके माथे पर बल भी नहीं आता I जो किसान इतना सवेंदनशील है कि क़र्ज़ वापस नहीं करने की स्थिति में होने वाली बदनामी और अपमान की सोच कर आत्महत्या कर लेता है उस किसान से प्रधान मंत्री उन उद्योगपतियों को ज़मीन देने की बात कर रहे हैं जिन्होंने सेज़ और अन्य परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ ज़मीन ले रखी है, उन्हें खाली रख छोड़ा है, या उनका किसी और उद्देश्य के लिए उपयोग किया है I
किसान वैसे ही सालों साल अपनी खेती की ज़मीन गवां रहा है और अपनी ही ज़मीनों पर मजदूर बन जाने को विवश हो रहा है I एक सरकारी समिति के आंकलन के अनुसार देश में 1990 से 2003 के दौरान 21 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि ग़ैर कृषि कार्यों में लग गयी है I ऐसे में उद्योगों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के पास पड़े खाली ज़मीनों का पता लगा कर उनका पुनः उपयोग करने, परती और बंजर पड़ी सरकारी ज़मीनों की पहचान करने और रेलवे तथा अन्य सरकारी महकमों की लाखों एकड़ ज़मीनों का उपयोग करने के बजाये मोदी सरकार किसानों की ज़मीन आसानी से उद्योगपतियों को देने के लिए कानून ला रही है और किसानों को मोदी जी 'मन की बात' में यह समझाने में लगे हैं कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है I
Monday, September 29, 2014
विकास का बुलडोज़र, ग़रीबों के आंसू और विकास की खुमारी में झूमता एक शहर
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| जेडीए की वेबसाइट पर उपलब्ध मानचित्र |
जयपुर में पिछले कई दिनों से रिंग रोड के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा हैI जयपुर का रिंग रोड जयपुर शहर के चारों तरफ 144.75 किलोमीटर एक 6 लेन की सड़क होगी I सड़क की चौड़ाई 90 मीटर है जबकि इस के दोनों तरफ कुल 270 मीटर जमीन पर रियल स्टेट विकसित होगा, मॉल्स और मल्टीप्लेक्सेज बनेंगे और ऊँची बहु मंजिली इमारतें खड़ी की जाएँगी I विकास की ये सारी कवायद एक विदेशी कम्पनी करेगी I इस विकास से किसको कितना लाभ होगा कुछ स्पष्ट नहीं है I विकास की इस प्रक्रिया में कितने किसान अपनी खेती की ज़मीन खो रहे हैं, कितने ग़रीबो के आशियाने उजाड़ रहे हैं इस की कोई स्पष्ट जानकारी कहीं एक जगह उपलब्ध नहीं है I
परियोजना में अपनी ज़मीन खोने वाले किसान उच्च न्यायलय तक गुहार लगा आये कि सरकार उनसे 90 मीटर सड़क के लिए आवश्यक ज़मीन ले ले लेकिन सड़क के दोनों तरफ जो मॉल्स वगैरह के लिए ज़मीन ली जा रही है वो ना ली जाये I लेकिन विकास की खुमारी में डूबे कोर्ट ने भी उनकी नहीं सुनी और परियोजना में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया I
विडम्बना यह भी है कि रिंग रोड के लिए भूमि का अधिग्रहण चूँकि पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत किया जा रहा है इसलिए प्रभावितों और विस्थापितों को पिछले वर्ष पारित भूमि अधिग्रहण कानून का भी कोई लाभ नहीं मिलेगा I उन्हें केवल मुआवज़ा मात्र पे सब्र करना होगा I ऐसे में जिन ग़रीबों के घर अभी टूट रहे हैं वो कहाँ जायेंगेI दैनिक भास्कर के अनुसार लोग पूछ रहे हैं कि क्या सरकार उन्हें एक घर भी नहीं दे सकती!
पीड़ा भरा प्रश्न : कई ऐसे लोगों के आशियानें उजड़ रहे हैं, जिनके पास रहने को छत नहीं है। कई लोग गरीबी रेखा में हैं, उनके पास जमीनें भी नहीं हैं। मुआवजे से जगह खोजकर छत बनाना मुश्किल है। जेडीए ऐसे लोगों को अफोर्डेबल हाउसिंग योजना में मकान नहीं दे सकता क्या? दे तो मदद मिले। (दैनिक भास्कर, जयपुर सितम्बर 30)
| 25 सितम्बर 2014 के दैनिक भास्कर से |
लेकिन अखबारों के पन्नों पर उजड़ रहे किसानों और ग़रीबों के आंसुओं की बूँद भी कहीं कहीं छलक ही पड़ती हैंI आप भी देख सकते हैं bhaskar.com से साभार ली गयीं कुछ तस्वीरें ............
विकास का बुलडोज़र और ग़रीबों के आंसू (तस्वीरें भास्कर.कॉम से साभार - लिंक यहाँ )
Friday, July 26, 2013
घटते किसान, बढ़ते कृषि मज़दूर
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| Daily News, Jaipur July 26, 2013 |
भारत की जनगणना 2011 के रोजगार संबंधित आंकड़े जारी हो गये हैं। इन आंकड़ों ने पिछले दो दशकों में कृषि तथा किसानों की बदतर हो रही स्थिति को ही उजागर किया है। उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के दौर में बढ़ते लागत खर्च, आयात-निर्यात पर छूट से सीधे विकसित देशों के कृषि उत्पादों से मुकाबला, महंगे एवं नकली कीटनाशकों की मार तथा उद्योगों, खाद्यानों एवं शहरीकरण के लिये किसानों से छीनी जा रही जमीनों ने कुल मिलाकर वो स्थिति पैदा की है कि देश भर में किसान खेती छोड़ कर खेतों में ही मज़दूर बन रहे हैं। 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार जहां किसानों की संख्या में कमी हुई है वहीं देश में कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ी है। देश में ऐसा पहली बार हो रहा है कि कृषि पर निर्भर मजदूरों की संख्या अपने खेत पर खेती कर रहे किसानों से अधिक हो गई है। देश में किसानों की कुल संख्या वर्ष 2001 में 12.73 करोड़ थी जो 2011 में कम हो कर 11.87 करोड़ हो गई है। जबकि इसी अवधि में कृषि मज़दूरों की संख्या 2001 में 10.66 करोड़ से बढ़ कर 2011 में 14.43 करोड़ हो गई है। देश के कुल कामगारों में कृषि मज़दूरों का प्रतिषत 2001 में 26.5 प्रतिषत से बढ़कर 2011 में 30 प्रतिषत हो गया है। जाहिर है छोटे एवं सीमांत किसान खेती छोड़ रहे हैं और खेत मज़दूर बनने को विवश हो रहे हैं। यह प्रक्रिया राजस्थान सहित पूरे देश में जारी है।
Saturday, April 9, 2011
मोमबत्तियों की रौशनी का दायरा
अण्णा जी ने आज (9 अप्रैल) अपना अनशन कोक या पेप्सी कंपनी के नींबू पानी से समाप्त कर दिया (टीवी पर नींबूज़, या फिर वो मिनिट मेड्स था !, के कई कार्टन दिखे, जिसे पीकर गांधीवादी अनशनकरियों ने अपना अपना अनशन तोड़ा) I उन्होंने देश भर में युवाओं में जो उत्साह जगाया वो हम सब को प्रभावित करता है I पीछे मंच पर, देश के आग के लपटों वाले मानचित्र में भारत माता की तस्वीर लगा कर तथा गांधी जी के सत्याग्रह को अपना कर उन्होंने संप्रंग सरकार को उनकी माँगें मानने को मजबूर कर दिया I
इस पूरे आंदोलन में उनके साथ अपने टीवी वाले भी ज़ोरदार ढंग से आगाए I मीडिया, जो पैसे लेकर खबरें छापता है और नेताओं को चुनाव के दिनों में सकारात्मक खबरें देने के लिए पैकेज बेचता है, भ्रष्टाचार के विरुद्ध अण्णा जी के साथ आ गया I नीरा राडीया से निर्देश लेकर लेख लिखने वाला हमारा मीडिया अण्णा जी के इस आंदोलन से काफी उत्साहित है और इसकी तुलना तहरीर चौक से कर रहा है I जो टीवी वाले नीरा राडीया से निर्देश लेते हैं कि उन्हें किसे क्या संदेश देना है और किस दल से क्या वक्तव्य लेना है, उनका भरपूर समर्थन मिला अण्णा जी को I
देश के उद्योगपती, जो भ्रष्टाचार का लाभ सब से पहले लेते हैं और सब से अधिक उसे बढ़ावा देते हैं - चुनाओं में राजनेताओं को करोड़ों चंदा दे कर और बाद में उसे भुना कर - वो भी अण्णा जी के समर्थन में उतर गए I अपने फिल्मी हीरो ओर हीरोइन भी काफी उत्साह से भाग लिए इस आंदोलन में I
देश के लगभग सभी शहरों में अण्णा जी के समर्थन में मध्य वर्ग खड़ा हो गया, अपनी मोमबत्तियों के साथ I ये मोमबत्तीयां आप और हम पहले भी देख चुके हैं, इंडिया गेट और गेटवे ऑफ इंडिया पे I जब ताज होटल पे हमला हुआ, जब आरुषि को न्याय नहीं मिला, जब रुचिका का गुनहगार छुट गया, जब जेसिका के हत्यारे बच गए I और इनमें से अधिकांश बार मध्य वर्ग की मोमबत्तियाँ जीत गयीं I लेकिन हाँ, यह ज़रूर कहना होगा कि इस बार मध्य वर्ग सबसे अधिक संख्या और उत्साह से अण्णा जी के आंदोलन में शामिल हुआ I
सरकार ने भी ना - ना करते करते अनशनकारियों की लगभग सभी माँगे मान ली I तो अब एक समिति बन गयी है जो लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाएगी, जिसे सरकार मॉनसून सत्र में ही सदन में रखेगी I ध्यान दीजिये की पिछली सरकारों ने पिछले 40 वर्षों से एक लोकपाल विधेयक, जिसमें एक कमज़ोर लोकपाल का प्रावधान है, को पारित नहीं किया है I अब आशा बनी है कि एक मज़बूत लोकपाल विधेयक पारित हो सकेगा I कुछ लोगों को चिंता है कि कहीं यह ज़्यादा ही मज़बूत ना हो जाए, जो अंततः लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होता I आशा है कि विधेयक का मसौदा बनाते समय समिति इन सभी बातों पर ग़ौर करेगी I
मध्य वर्ग कैसे और क्यों इस आंदोलन में इस बड़े स्तर पर शामिल हो पाया इस पर अभी समाजशास्त्रियों और राजनीति के विद्वानों के विश्लेषण आने बाक़ी हैं, लेकिन कुछ जिज्ञासा है मन में (फिलहाल तो जो स्थिति है, उसमें आशंका करने की इजाज़त नहीं है) I
दस वर्षों से इरोम शर्मिला नाम की एक महिला आमरण अनशन पर बैठी हैं, जो देश के कई हिस्सों में थोपे गए AFSPA नाम के कानून को भंग करने की माँग कर रही हैं I ये कानून उत्तर-पूर्व तथा कश्मीर में सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार देता है I सुरक्षा बलों द्वारा इस अपने अधिकारों और हथियारों का दुरुपयोग के मामले नए नहीं हैं I ऐसे में सुरक्षा बलों को अत्यंत ही ग़ैर लोकतान्त्रिक ढंग से केवल शक के आधार पर गोली मार देने का अधिकार देने वाला यह कानून उत्तर पूर्व के कई क्षेत्रों में लगभग 5 दशकों से लागू है I ऐसे कानून का विरोध उसी अनशन से करने वाली इरोम शर्मिला का नाम भी फेसबूक और ट्विटर के मध्य वर्गीय क्रांतिवीरों में से अधिकांश को शायद ही मालूम हो I
AFSPA एक अकेला आलोकतांत्रिक कानून नहीं है I ULAPA नमक एक अन्य केंद्रीय कानून है जो सरकार को TADA तथा POTA जैसे कानूनों की तरह असीमित अधिकार देता है I छत्तीसगढ़ तथा महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में राज्य स्तर पर ऐसे कानून लागू हैं I राजद्रोह के विरुद्ध एक कानून है जो सरकार की आलोचना के लिए किसी को भी जेल भेज सकता है I राजद्रोह के विरुद्ध कानून तथा छत्तीसगढ़ के संविधान विरोधी कानून के सहारे सरकार ने बिनायक सेन को जेल में डाल रखा है I बिनायक सेन देश की संविधान में विश्वास रखने वाले एक ऐसे डॉक्टर हैं जिन्होंने वर्षों छत्तीसगढ़ के ग़रीब तथा शोषित आदिवासियों के बीच काम किया है I लेकिन उन्हें जेल भेजने वाली सरकार से हमारे वैबसाइट वाले मध्य वर्गीय क्रांतिकारियों को कोई शिकायत नहीं है I
छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा समेत देश के सभी हिस्सों में बहुराष्ट्रीय और देशी कंपनियों द्वारा हमारे संसाधनों की लूट जारी है I और यह लूट भ्रष्टाचार से नहीं, सरकार से बाक़ायदा MOU करके की जा रही है I बात केवल मधु कोड़ा जैसे मुख्यमंत्रियों या राजा जैसे मंत्रियों की नहीं है I बल्कि ये समझना ज़रूरी है की देश के संसाधनों की लूट की छुट, नीति बनाकर देश की प्रगति के नाम पे, दी जा रही है I यह कहा जाता है कि हमारे जंगलों, खनिज संसाधनों, नदियों, ज़मीनों, जल संसाधन पे देशी – विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा होने देना देश के प्रगति के लिए – जो कम से कम 9% वार्षिक की दर से ही होनी चाहिए – आवश्यक है I संसाधनों को कौड़ियों के भाव उद्योगों को देने कि नीति तो है ही, उद्योग जगत हमारे भ्रष्ट तंत्र का फायदा उठाने में कहीं से पीछे नहीं है I राजा और कोड़ा इन्हीं उदारवादी नीतियों के संरक्षण में भ्रष्ट होते जाने के प्रतीक हैं I
संसाधनों के दोहन करने तथा उद्योग लगाने के लिए लाखों आदिवासी, दलित, ग़रीब, किसान, मज़दूर अपने खेतों, गाँवों, जंगलों, ज़मीनों तालाबों, नदियों से बेदखल किए जा रहे हैं I अपने आजीविका तथा अपने जड़ों से विस्थापित इन विकास पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई क़ानून नहीं है I विस्थापन का विरोध करने वाले ग़रीब आदिवासी सरकारी कोप के शिकार हो रहे हैं I देश भर में विस्थापन विरोधी आंदोलनों को दबाने में सरकार अधिकाधिक निर्मम तरीक़े अपना रही है I ग़रीबों के विस्थापन या संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का विरोध करने वाले न सिर्फ विकास विरोधी कहे जाते हैं, बल्कि उन्हें मावोवादी या उनका समर्थक घोषित किया जा रहा है और जेलों में बंद किया जा रहा है I लेकिन मध्यवर्ग कि मोमबत्तियों को यह प्रत्यक्ष अन्याय दिखाई नहीं पड़ता या वो इससे निरपेक्ष रहती हैं I क्यों? क्या इसलिये कि इन उदारवादी नीतियों का लाभार्थी मध्य वर्ग भी है I क्या कारण है कि मीडिया को विस्थापन विरोधी आंदोलनों से कोई सहानुभूती नहीं है I
पिछले दो दशकों में जब से उदारवादी भूमंडकीकरण का दौर चला है, देश में लाखों किसानों ने आत्महत्या कर लिया है I आंध्र और विदर्भ ही नहीं, पंजाब और गुजरात जैसे संपन्न राज्यों में भी किसानों को भूमंडलीकरण के नीति की क़ीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी है I परंतु मध्य वर्ग के लिए यह सब कभी मुद्दा नहीं बना I देश के ग़रीब आदिवासी, दलित, किसान – मज़दूर ज़रूर अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं – कभी विस्थापन के विरोध में तो कभी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के विरोध में I लेकिन न तो देश का मध्य वर्ग उनके साथ आता है न ही मीडिया का समर्थन उन्हें मिलता है I क्यों ग़रीबों, आदिवासियों, किसानों, मज़दूरों के आंदोलन अलग थलग पड़ जाते हैं और उन्हें मध्यवर्ग का समर्थन नहीं मिलता I क्या ये स्पष्ट हो गया है अब कि शहरी मध्य वर्ग, अपने मॉल, मल्टीप्लेक्स, और पिज़्ज़ा हट से बाहर केवल अपने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही आयेगा I और ग़रीबों, किसानों, आदिवासियों और दलितों के जीवन से जुड़े प्रश्न उसके लिए अर्थहीन हैं I
पिछले कई वर्षों से केंद्र सरकार उद्योग जगत को लाखों करोड़ की टैक्स छुट देती रही है I देश में आर्थिक विकास (कम से कम 9% की दर से) को बढ़ावा देने के लिए दिया गया यह छूट पिछले वित्तीय वर्ष में लगभग 4.6 लाख करोड़ का था, जबकि उस वर्ष में केंद्र सरकार का कुल बजट लगभग 10 लाख करोड़ का था I क्या एक ग़रीब देश में जहाँ ग़रीब आबादी के शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, भोजन आदि के लिए कार्यक्रमों के लिए पैसे की का बहाना कियाजाता है, यह किसी भ्रष्टाचार से कम है I परंतु मीडिया या मध्यवर्ग को यह नीतिगत भ्रष्टाचार दिखायी नहीं देता I क्या मध्य वर्ग की मोमबत्तियों की रौशनी का दायरा इतना सीमित है I


