भूमिका: सरकार के यह पसंदीदा हथियार हैं I जिसे चाहो गिरफ्तार करो, जिसे
चाहो सज़ा दो I कम से कम निचली अदालतें तो इन ‘आपराधों’ के मामले में पुलिस और सरकार के तर्कों को ही सही
मानती हैं I इस देश में पुलिस चोरी, डकैती, हत्या, लूट, बलात्कार, व भ्रष्टाचार के मामलों में जितनी ढिलाई से काम
लेती है, राजद्रोह,
राष्ट्रद्रोह आदि के मामलों में उतनी ही तत्परता दिखती है I तो स्थिति ये बनती है जनाब कि आप चोरी करो, डाके डालो, बलात्कार करो, हत्या भी कर दो तो एक बार बच जाओगे, लेकिन इस देश की देशप्रेमी सरकार और पुलिस आपको राजद्रोह, देशद्रोह करने पर बिलकूल नहीं छोड़ेंगे I
परंतु देशद्रोह या
राजद्रोह है क्या?
सरकारी अधिकारियों व
नेताओं के साथ मिलकर देश-विदेश की कंपनियों द्वारा देश की सारी प्राकृतिक संपत्ति
पर कब्ज़ा जमा लेना देशद्रोह नहीं है, सरकारी अधिकारियों व राजनेताओं द्वारा तरह तरह के
घोटाले करना देशद्रोह नहीं है, भोपाल जैसी खतरनाक औद्योगिक दुर्घटनाओं को होने
देना और उसके ‘अपराधियों’ को देश
से सुरक्षित निकल जाने देना देशद्रोह नहीं था I उस दुर्घटना के कई दशक बाद भी उस खतरनाक मलवे को वहीं पड़े रहने
देना देशद्रोह नहीं है I
1984 और 2002 के दंगे देशद्रोह
नहीं थे I बाबरी मस्जिद को गिरा देना देश द्रोह नहीं था I
सुरक्षा के पक्के उपाए किए
बिना खतरनाक जनसंहारक अणु ऊर्जा संयंत्र लगाना भी राष्ट्र हित में है, लाखों आदिवासियों, ग़रीब किसानों की ज़मीनें छीन लेना, उन्हें बाँधों में डुबो देना अर्थव्यसथा के हित में आवश्यक है I
देशद्रोह है कार्टून बनाना, देशद्रोह है संगठन बनाना, देशद्रोह है माओ,
मार्क्स, लेनिन की किताबें पढ़ना, देशद्रोह है सवाल पूछना, देशद्रोह है विकास के नाम पर पर्यावरण, जंगल ज़मीन, जल,
नदियों की हो रही तबाही पर सवाल उठाना, देशद्रोह है समाज के ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं की पक्ष में खड़ा होना I
और मजेदार यह है कि सरकार
को हमेशा मालूम रहता है कि इन देशद्रोहियों के पीछे विदेशी हाथ है, विदेशों एनजीओ हैं I फिर भी
सरकार उन मूए विदेशियों का कुछ नहीं करती I उल्टे हमारी
सरकारें विदेशी कंपनियों से इस देश में आकार चावल-दाल, नून-तेल से लगाकर कम्प्युटर-मोबाइल तक सब कुछ बनाने और बेचने के लिए उनकी मिन्नत करती रहती हैं
I बस थोड़ी सी सावधानी के साथ I आईए देखते हैं एक राजनेता का (काल्पनिक) बयान जो बहुराष्ट्रीये कंपनियों के
एक समूह के सामने पढ़ा गया होता परंतु फ़ाइल बदल जाने के कारण नहीं पढ़ा जा सका I
नमस्कार हुज़ूर ! राम राम ! सलाम ! गुड ईवनिंग !हुज़ूर हमने धंधे के महत्त्व को समझा है और जाना है हुज़ूर I बाज़ार की स्वतंत्रता और इफिसिएंशी को समझा है I ग्रोथ के मोक्ष को प्राप्त किया है उसे बनाये रखना चाहते हैं I और ये तभी होगा हुज़ूर जब धंधे को फलने फूलने दिया जाए I इसीलिये हुज़ूर आओ और इस देश में अपनी फ़ैक्टरी लगाओ, यहाँ आकार माइनिंग करो, यहाँ परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाओ, यहाँ आकार नून-तेल कि दूकान खोलो, यहाँ युनिवर्सिटी और कॉलेज खोलो और जो मर्ज़ी आए और जैसे मर्ज़ी आए वैसे करो I आप तो बस यहाँ धंधा कर के हमें धन्य करो I इसमें आपका साथ हमारे देशी धंधेबाज भी खूब देंगे I उनके साथ मिल के धंधा करो या अलग से करो जैसे मर्ज़ी आए वैसे धंधा करो I वैसे भी हमारे देशी उद्योगपती अफ्रीका, लातिन अमेरिका, और यूरोप तक जा रहे हैं धंधा करने, ज़मीनें और खदान खरीदने तो फिर आपका भी हक़ बनता है Iआईए हुज़ूर हम आपको सस्ती ज़मीनें देंगे, सस्ते में स्पेक्ट्रम देंगे, अभी अभी हम ने मुफ्त में अपने कोयला खदान इन देशी धंधेबाजों कि दिये हैं I आपको थोड़ी क़ीमत लेकर दे देते हैं I बुरा नहीं मानिएगा लेकिन थोड़ी क़ीमत तो लेनी पड़ती है हुज़ूरI एक दम से मुफ्त में कैसी दे देंगे I और आप नहीं आयेंगे तो हमारे देसी धंधे बाज़ कौन अच्छे हैं I वेल्लारी से गोवा तक कमबख्तों ने लूट मचा रखी है बिना कोई टैक्स दिये सारा लोहा निकाल रहे हैं I हाँ अच्छी बात यही है कि उसको भी भेजते विदेश ही हैं I इस तरह कुछ विदेशी मुद्रा तो आती है न हुज़ूर देश में Iक्या कहा ! मज़दूरी, वेतन, लेबर कानून !! अरे वो सब हम देख लेंगे.... सेज़ कानून बना दिये हैं आपके लिए ... और ऐसे भी यहाँ मज़दूरी डॉलर में थोड़े है हुज़ूर I कांट्रैक्ट लेबर रख लीजिये I हमारा लेबर डिपार्टमेंट किस लिए है, इसीलिये न कि आप जैसे देश सेवा के कार्य में लगे लोगों को मज़दूरों कि तरफ से परेशानी नहीं हो I होंडा से लेकर सुज़ुकी तक जब भी मज़दूरों ने मुश्किल किया हुज़ूर हमारी सरकार और पुलिस ने तो आप ही का साथ दिया है Iहें हें हें हें कैसी बात करते हैं सभी पेमेंट चेक से थोड़े ही होता है हुज़ूर I और यह बातें तो होती रहेंगी I पहले तो आप आईए और इस देश कि जनता, जंगल, ज़मीनों, नदियों, तालाबों, खदानों का उद्धार कीजिये I और ये हमारे देश के नेता हैं ना हुज़ूर समझते नहीं नहीं हैं I थोड़ा खर्चा इनके एडुकेशन पे करते रहिए हुज़ूर I इससे कोंसेन्सस बनाने में मदद मिलती है I क्या कहा, मीडिया I उसमें तो सब आपके भक्त ही हैं हुज़ूर वहाँ कहाँ कोई दिक्कत नहीं है I वहाँ तो सब पढ़े लिखे लोग हैं, आपके आने के फायदे समझते हैं Iबस हुज़ूर एक ही अर्ज़ है आप ही आईए अपने एनजीओ को कहिए वहीं रहें I इस देश कि जनता जो है न, हुज़ूर, कई दशकों से डेमोक्रेसी, ह्यूमन राइट, लेबोर राइट, वुमन राइट, इंडिजिनस राइट, कंज्यूमर राइट, इन्वाइरोनमेंट प्रोटेक्शन और ना जाने क्या क्या बात करती रहती है I इन सबको जानती है I और बुरा मत मानिएगा हुज़ूर इस में से ज़्यादा तर खुराफात आप ही लोगों के ने पैदा किया है I अब कम से कम अपने एनजीओ लोगों से तो कहिए कि यहाँ से दूर रहें I इस देश के खुराफातीयों के लिए तो हमने कई कानून अंग्रेज़ राज के ही रख छोड़े हैं और कई नए बना लिए हैं I और ये यहाँ के हों या वहाँ के, झोला और लैपटाप लिए चलते हैं और हमारे लिए भी मुसीबत बनते हैं और आपके लिए भी I इनसे तो मिल के ही लड़ना होगा हुज़ूर Iवैसे सब एनजीओ खराब नहीं हैं हुज़ूर I ज़्यादातर तो प्रोजेक्ट लाते हैं और विकास करते हैं, शांति से I हमें भी बुलाते हैं अपने प्रोग्राम में I हमारी सरकारें भी करोड़ों देती है इन एनजीओ वालों को I आउटसोर्सिंग हुज़ूर आप ही से सीखा है I लेकिन इन में कुछ सरफिरे होते हैं I पहुँच जाते हैं कुडनकूलम, जैतापुर, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़ीसा I अरे एनजीओ हो तो विकास का काम करो I स्कूल चलाओ, बच्चों का टीकाकरण कराओ, महिलाओं के समूह बनवाओ, वाटेरशेड बनाओ, वर्षा जल को इकठ्ठा करो I लेकिन नहीं, कुछ सिरफिरे एनजीओ बना कर उल्टे विकास का विरोध करने लगते हैं I हमें इन से ही निपटना होता है Iअमेरिका का नारा “वार ऑन टेर्रोर” बड़ा अच्छा है I इसका ही इस्तेमाल यहाँ इन विकास विरोधियों को रास्ते पर लाने के लिए होता है I तभी थोड़ा शोर शराबा होता है कि ह्यूमन राइट्स का वोइलेशन हो रहा है, फ्रीडम ऑफ स्पीच खतम हो रहा है वग़ैरह वग़ैरह I आप उन सब पे ध्यान नहीं दें हुज़ूर I वैसे हमने यहाँ माहौल यही बना रखा है कि ये सारे काले (वही कुछ एनजीओ वाले कहते हैं) कानून इस्लामी आतंकियों और लाल उग्रवादियों से निपटने के लिए बनाये हैं I और हमारा मध्यम वर्ग काफी खुश भी होता है जब यह कानून इस नाम पर लगाये जाते हैं I मध्यम वर्ग को लगता है कि भारत अब सॉफ्ट स्टेट नहीं रहा I लेकिन कभी कभी मस्त मौला मध्यम वर्ग भी बहकावे में आ जाता है I क्या करें, इस आईटी ने धंधा तो खूब दिया लेकिन सोशल मीडिया नाम कि चीज़ भी बना दिया I और मध्यम वर्ग, जो दिन रात फ़ेसबूक और ट्विटर पे लगा रहता है, कभी कभी वहीं से इन बहकाओं में आ जाता है I अब उन्हें कौन समझाये कि ये फ़ेसबूक और ट्विटर मज़े मनोरंजन के लिए है विकास, बाज़ार, ग्रोथ, इकॉनमी जैसे सिरियस बातों के लिए नहीं है I वैसे हम इस फ़ेसबूक और ट्विटर का भी कुछ उपाए कर रहे हैं, आप चिंता नहीं करें I आप तो बस अपने बिज़नेस प्लान हमें भेजिये हम तत्काल स्वीकार करेंगे I
bahut hi sahi kaha hai...hum sub jo log NGO ya development sector se jude hai..who tou in bato ko samajhte hain..lekin humare jise yuva doston ko samjha paye tau acha hoga...
ReplyDeletebesharmi ki aise had tau kanhi nahi dekhi..lekin kuch chize aise hoti hain jisko samjhana aur uske bare mein bolna bhi ek musibat hai...humara sathi hi naraz ho jayange.
bahut acha lika...likhte rahiye...