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Tuesday, July 9, 2019

केंद्रीय बजट 2019 -20: एक विश्लेषण


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Sunday, June 28, 2015

विकास एक अभिशाप है

विकास एक अभिशाप है 

विकास एक शापित शब्द है 
यह धो देता है एक हत्यारे के दामन के दाग़ तथा बना देता है उसे एक मसीहा 
विकास के जाप से एक हत्यारा गिरोह दिखने लगता है एक प्रगतिशील समूह 
जिसके हाथों लोग सौंप देते हैं अपना भविष्य 

विकास लूट लेता है ग़रीबों, किसानों, आदिवासियों की ज़मीन 
छीन लेता है उनसे उनके जंगल, पहाड़ और नदियाँ 
कर देता है उन्हें बेघर और विस्थापित 

शहरों में अंटी पड़ी प्रदुषण फैलाती गाड़ियों की भीड़, ऊँचे फलाई ओवर, चौड़ी होती सड़कें 
और ऊँचे से ऊँचे मॉल प्रतिक हैं विकास के 
ऊँचे और बड़े बांध, बड़े बड़े कारखाने, जंगलों को बर्बाद करते खदान 
ही वो जगह हैं जहाँ पैदा होता है विकास 
बर्बाद जंगल, ढहते पहाड़, गंद्लाती नदियाँ 
परिणाम हैं इस विकास का 

जीडीपी के आंकड़ों का मायाजाल, शेयर बाज़ार के सूचकांक का गिरना उतरना पैमाने हैं विकास के 
इसमें कहीं नहीं हैं हमारी और आपकी ज़िन्दगी से जुड़े सवाल 
इसमें नहीं है भूखे कमज़ोर बच्चों के होंटों की मुस्कान इसमें नहीं है ग़रीब कमज़ोर लाचार माओं के चेहरे की आशा – निराशा 
इसमें नहीं है बूढ़े बीमार पिताओं के इलाज का सामान 
इसमें नहीं है नौजवानों के रोज़गार के सवाल या लड़कियों की शिक्षा के उपाए 
हाँ, विकास बस एक अभिशाप है

Monday, March 23, 2015

बर्बाद किसान और 'मन की बात' में मगन सरकार

इस हफ्ते प्रधान मंत्री मोदी ने जब रेडियो के अपने कार्यक्रम 'मन की बात' के तहत किसानों को संबोधित करने का फैसला किया तब देश का किसान पिछले दशकों के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा था I और तब मोदी सरकार भी शायद अपने 10 महीनों के शासनकाल की सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही थी I

देश के किसान बड़े पैमाने पर हुए बेमौसम बारिश तथा ओले की मार से बर्बाद हुए अपने खड़े फसलों के मारे बेटियों की शादियों के टल जाने तथा महाजन और बैंकों के कर्ज़ों को लौटा न पाने से होने वाले अपमान के डर से ख़ुदकुशी कर रहे थे, अपने बच्चों को स्कूलों से हटा रहे थे, अपनी बीमारियों के इलाज को मुल्तवी कर रहे थे I देश में किसानों तथा खेती के हालत दशकों से अंत्यंत नाजुक हैं तथा पिछले दो दशकों में हज़ारों किसानों ने ख़ुदकुशी किया है I लेकिन पिछले हफ्ते देश के अधिकतर हिस्सों में हुए बेमौसम बरसात तथा ओलावृष्टि ने जब उनके खेतों में खड़ी लगभग तैयार फसल रातों रात बर्बाद कर डाली तब तो जैसे उनकी कमर ही टूट गयी I प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि महाराष्ट्र से ऊपर लगभग सभी राज्यों में फसलों की भारी बर्बादी हुई है I

वहीँ मोदी सरकार भी 2013 में मनमोहन सरकार द्वारा संसद में पारित नए भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून को पूरी तरह से पंगु बना देने के उद्देश्य से लाये एक अध्यादेश, जिसे मीडिया आम तौर पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा सुधारवादी क़दम बताता है, को विधेयक के रूप में लोकसभा में पारित करवाने के बाद, इसे राज्यसभा में पारित करवा कर उद्योगपतियों, देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा विदेशी निवेशकों की नज़र में खुले बाज़ार तथा उद्योग धंधों के सबसे बड़े समर्थक सरकार की अपनी छवि को पुख्ता कर लेना चाहती थी I लेकिन उनकी मुश्किल यह थी (और है) कि राज्यसभा में उनकी पार्टी अल्पमत में है तथा सभी विपक्षी दल इस विधेयक को किसान विरोधी बताते हुए एकजूट हो गए हैं I

ऐसे में जब मोदी जी ने किसानों से उनकी संकट की इस घड़ी में 'मन की बात' में उन्होंने किसानों के सर आ पड़ी इस आफत की बात शुरू करी ज़रूर लेकिन जल्दी ही वो किसानों से अपनी सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल, भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून में संशोधन विधेयक को विपक्ष द्वारा पारित नहीं होने दिए जाने, का रोना ले कर बैठ गए I ज़ाहिर है इस कार्यक्रम का नाम "मन की बात" है, तथा मोदी जी ने अपने मन की बात, या कहीये, भड़ास किसानों को सुना डाली I

अब इसका तो सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि दुखी किसान भाइयों बहनों को प्रधान मंत्री के चिंतित मन की बात सुन कर कैसा लगा I देश के करोड़ों छोटे और मंझोले किसानों ने "बहुत हुआ किसानों पे अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार" के नारे पर भाजपा को अपना मत दिया था और प्रधान मंत्री ने जब उनसे "मन की बात" की तो उन्हें यह समझाने लगे कि बिना उनकी (किसानों की) सहमती के उनकी ज़मीनें लेकर बड़े उद्योगपतियों को देना क्यों ज़रूरी है I

चुनाव से पूर्व उनकी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि उनकी सरकार आई तो किसानों को खेती पर होने वाले लागत खर्च का कम से कम आधा मुनाफा दिलाना सुनिश्चित किया जायेगा I
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया था कि वो सत्ता में आई तो कृषि और ग्रामीण विकास में सरकारी निवेश बढाया जायेगा I लेकिन इस वर्ष ही बजट में मोदी सरकार ने कृषि मंत्रालय को आवंटित कुल बजट में पिछले वर्ष के मुकाबले 2848 करोड़ रुपये की कटौती की है I ज़ाहिर है मोदी जी किसानों से 'मन की बात' में अपने इस वादाखिलाफ़ी की बात तो करते नहीं तो किसानों को उनके लागत खर्च से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिलाने के उपायों की चर्चा करने के बजाये मोदी जी उन्हें ये बताने लगे कि 2013 के कानून की सबसे बड़ी कमी क्या है I और आदतन मोदी जी ने यहाँ भी आधे सच का सहारा लिया I

मोदी जी ने 'मन की बात' में किसानों को कहा कि 2013 का कानून आनन फानन में लाया गया था I जबकि सच यह है कि इस कानून को वर्षों के विचार विमर्श के बाद लाया गया था I  भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून 2013 का पहला मसौदा 2011 में आया था जिस पर ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति, जिसकी अध्यक्ष लोकसभा की वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन थीं, ने काफी गहन विमर्श किया था I लेकिन युपीए के पहले शासन काल में भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन के लिए दो अलग अलग विधेयक आये थे तथा लोक सभा में पारित हुए थे लेकिन राज्य सभा में पारित नहीं हो सके थे I ज़ाहिर है कि इस विषय पर कानून बनाने कि कवायद लंबे समय से चल रही थी I

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि 2013 के कानून में 13 ऐसे कानून, जिनके तहत भूमि अधिग्रहण की जा सकती है, को यह छूट है कि उनके अधीन होने वाले भूमि अधिग्रहण में पुराने मुआवज़े को जारी रखा जाये I अब यह आधा भी नहीं पूरा झूठ है I यह सच है कि 2013 का कानून 13 केंद्रीय कानूनों के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण कि स्थिति में कई छूट देता है, जैसे सामाजिक प्रभाव आंकलन तथा निजी एवं निजी-सार्वजनिक भागीदारी के लिए लिए जाने वाली ज़मीन के लिए क्रमशः 70 तथा 80 प्रतिशत प्रभावितों की आवश्यक सहमती, अनुसूचित क्षेत्रों में  ग्राम सभा को विशेष अधिकार आदि I लेकिन ये छूट मुआवजा और पुनर्वास और पुनार्वासन के मामले में नहीं था I इन 13 कानूनों पर भी 2013 के कानून के  मुआवजा और पुनर्वास और पुनार्वासन संबंधित प्रावधान लागु होने थे, जिसके लिए सरकार को एक 2013 के कानून के लागू होने के एक साल के अन्दर आदेश (अधिसूचना) निकलना था I हाँ यह आदेश निकलने की ज़िम्मेदारी ज़रूर मोदी सरकार की थी, क्योंकि 1 जनवरी 2014 से नया कानून लागु हुआ और मई 2014 में देश की जनता ने मोदी जी को अपना प्रधानमंत्री चुन लिया था I

लेकिन मोदी सरकार ने जो अध्यादेश तथा अब विधेयक  2013 के भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून में परिवर्तन के लिया लाया उसने न केवल उन 13 कानूनों के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण के मामले में 2013 के कानून के विशेष प्रावधानों के छूट को जारी रखा बल्कि 5 और प्रकार कि परियोजनाओं के मामले में होने वाले भूमि अधिग्रहण में भी यह छूट बढ़ाने का प्रावधान कर दिया I इसके अलावा 'कम्पनी' शब्द की जगह 'निजी इकाई' शब्द ला दिया जिससे निजी क्षेत्र जिनके लिए भूमि अधिग्रहण हो सकता था उसका दायरा और बढ़ गया I इसके अलावा भी इस विधेयक में किसानों के हितों के विरुद्ध और निजी क्षेत्रों के हित में कई प्रावधान हैं जिन्हें यहाँ और यहाँ पढ़ा जा सकता है I

लेकिन इस पुरे खेल में सबसे मज़ेदार बात यह है कि 2013 के कानून की जो भी कमियां रही हों उसका पता मोदी जी को तब नहीं चला जब उन्की पार्टी ने संसद में उस कानून का समर्थन किया थाI उसके पहले तब भी नहीं जब उनकी पार्टी की एक वरिष्ठ सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता में ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय समिति उस कानून के बनने के पूर्व उसके मसौदे पर विचार कर रही थी, जिस में भाजपा सहित सभी दलों के सांसद थे I इस समिति ने काफी बड़े स्तर पर विचार विमर्श किया था जिसमें भाजपा शासित राज्यों सहित कई राज्य सरकारों ने भी अपने पक्ष रखे थे I यही नहीं उस संसदीय समिति में औद्योगिक संगठनों ने भी अपने पक्ष रखे थे I

मोदी जी को 2013 के कानून की कमियों का पता तब भी नहीं चला जब वो लोकसभा चुनावों के पूर्व अडानी के जहाज़ में घूम घूम कर महीनों अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे थे I मुझे नहीं याद आता कि तब उन्होंने एक बार भी 2013 के  भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून की आलोचना करी हो I
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के दौरान 
मोदी जी को 2013 के कानून की कमियों का पता तब चला जब उनकी सरकार बन चुकी थी और अब उन्हें अपनी बाज़ार व उद्योग समर्थक आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाना था I और तब उनकी सरकार ने 2013 के कानून में बदलाव के पक्ष में माहौल बनाने के लिए पहले सभी राज्यों के राजस्व मंत्रियों की एक बैठक बुलाई जिसमें उनसे कहा गया कि वो इस कानून में जो बदलाव चाहते हैं उस पर अपने सुझाव रखें I ज़ाहिर है अपने राज्यों में अधिक से अधिक निवेश लाने के दबाव में काम कर रहे राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार के सकारात्मक रुख को देखते हुए, कांग्रेस शासित राज्यों ने भी, इस महज़ कुछ महीने ही पुराने कानून में कई बदलावों के सुझाव दे डाले I

लेकिन मज़ेदार यह है कि सभी दलों के  भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास तथा पुनःस्थापन कानून 2013 के विरोध में होने का दावा करने के बावजूद मोदी सरकार ने इस कानून के संशोधनों को संसद की पटल पर रखने के बजाये अध्यादेश के रूप में लाना ज़रूरी समझा I अब इस अध्यादेश को कानून बनाने की क़वायद जारी है और विपक्षी दलों ने मोदी सरकार, जो मित्र से ज़यादा दुश्मन बनाने में यकीन रखती है, को घेरने के लिए और देश के किसानों के मिजाज़ को भांपते हुए अपने सुर बदल लिए हैं और राज्य सभा में इस किसान विरोधी विधेयक को पारित नहीं होने देने के लिए सोनिया गाँधी को अपना नेता मान लिया है I

ज़ाहिर है कि यदि रजनीति परसेप्शन का खेल है तो मोदी सरकार इस खेल में पिछड़ रही है तथा आज़ादी के 66 वर्षों में सर्वाधिक वर्ष राज करने वाली कांग्रेस, जिसने अपने शासन काल में अंग्रेजों के बनाये भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 का बिना झिझक न सिर्फ उपयोग किया बल्कि दुरूपयोग भी किया, को आज अपने आपको को किसान समर्थक बताने का मौका मिल गया है I यही नहीं उनके इस भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध न केवल विपक्षी दल और किसान संगठन कर रहे हैं बल्कि उनकी पार्टी भाजपा के अन्दर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं I लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कोई और नहीं केवल मोदी जी ही हैं I

कैसा लगा होगा किसानों को मोदी जी के 'मन की बात' सुनकर !  उन्हें शायद ये समझ ही नहीं आ रहा हो कि ये कैसा प्रधान मंत्री है और किसके मन कि बात कर रहा हैI कोई प्रधान मंत्री किसानों से उनके सबसे बड़े संकट के समय में उन्हें यह समझाने कि कोशिश कैसे कर सकता है कि उनकी ज़मीन उनसे बिना मर्ज़ी के छीन लेना क्यों ज़रूरी है I प्रधान मंत्री वास्तव में उनसे किसके मन बात कर रहे थे I अपनी या किसानों की या उन उद्योगपतियों की जो सरकार से टैक्स और ज़मीन सहित कई तरह की छूट लेते हैं, देश के सभी बैंकों से करोड़ों का क़र्ज़ लेकर वापिस नहीं देते और उनके माथे पर बल भी नहीं आता I जो किसान इतना सवेंदनशील है कि क़र्ज़ वापस नहीं करने की स्थिति में होने वाली बदनामी और अपमान की सोच कर आत्महत्या कर लेता है उस किसान से प्रधान मंत्री उन उद्योगपतियों को ज़मीन देने की बात कर रहे हैं जिन्होंने सेज़ और अन्य परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ ज़मीन ले रखी है, उन्हें खाली रख छोड़ा है, या उनका किसी और उद्देश्य के लिए उपयोग किया है I

किसान वैसे ही सालों साल अपनी खेती की ज़मीन गवां रहा है और अपनी ही ज़मीनों पर मजदूर बन जाने को विवश हो रहा है I एक सरकारी समिति के आंकलन के अनुसार देश में 1990 से 2003 के दौरान 21 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि ग़ैर कृषि कार्यों में लग गयी है I ऐसे में उद्योगों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के पास पड़े खाली ज़मीनों का पता लगा कर उनका पुनः उपयोग करने, परती और बंजर पड़ी सरकारी ज़मीनों की पहचान करने और रेलवे तथा अन्य सरकारी महकमों की लाखों एकड़ ज़मीनों का उपयोग करने के बजाये मोदी सरकार किसानों की ज़मीन आसानी से उद्योगपतियों को देने के लिए कानून ला रही है और किसानों को मोदी जी 'मन की बात' में यह समझाने में लगे हैं कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है I


Monday, December 8, 2014

Economic Growth at What Cost?

[Reflections after my Indonesia trip in October 2014, first published on http://csnbricsam.org/]


The economy must grow and fast, so that the size of the pie increases and there is a bigger share for everyone.

These were the opening remarks of the then Deputy Finance Minister of Indonesia said this (paraphrased) at the conference on “Redemocratisation of Economic, Social and Political for Inclusive Development” organized by INFID, a national network of Indonesian NGOs.

I was not quite surprised to hear that. Politicians all over the world seem to be thinking alike. They want faster and stable economic growth at any cost. We hear similar views in India. The emphasis on growth is almost universal today. The Minister also praised the Indonesian government’s policies which could achieve the sustained and continuous economic growth.

Monday, August 11, 2014

राजस्थान के अच्छे दिन

राजस्थान की जनता बड़ी दूरदर्शी है। उनहोंने केंद्र में नयी सरकार आने के छह माह पूर्व ही अच्छे दिनों की पदचाप सुन ली थी  और इसीलिए राज्य में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत दे कर सत्ता में लायी। भारतीय जनता पार्टी ने जैसा कि पहले से तय था, महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया जी को मुख्यमंत्री बनाया।

महारानी ने सत्ता सँभालते ही सबसे पहले ये किया कि राज्य आयोजना समिति (स्टेट पलानिंग बोर्ड) का पुनर्गठन किया तथा इस बोर्ड में देश के बड़े बड़े उद्योगपतियों, दिल्ली के एक अर्थशास्त्री, बंगलुरु के गवर्नेंस एक्सपर्ट्स और राज्य के कुछ भूतपूर्व तथा वर्तमान बड़े अधिकारीयों को रखा ।

परन्तु तुरंत ही महारानी मतलब मुख्यमंत्री महोदया को यह राज्य आयोजना समिति नाकाफी लगी और उनहोंने उसे भंग कर एक मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद् (पूर्व केंद्र सरकार से कुछ तो सिखना चाहिए ना) का गठन किया जिसमें पूर्व की आयोजना समिति के अधिकांश सदस्यों के अलावा विदेश में पढ़ा रहे एक भारतीय अर्थशास्त्री, जिनका नाम देश के प्रधान मंत्री के आर्थिक सलाहकार के संभावितों में भी चला था, को शामिल किया। अपनी पहली ही बैठक में  इस सलाहकार परिषद् ने महारानी को ये सलाह दे डाली कि अगर राज्य में अच्छे दिन लाने हैं तो सरकार जनता को कुछ भी मुफ्त ना बाँटे ।

परन्तु राज्य की सरकार को इस सलाह का इंतज़ार कब था । सरकार ने तो अच्छे दिनों के प्रयास पहले ही आरंभ कर दिए थे। सरकार ने जुलाई में पेश किये बजट में और उसके बाद से ही मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा योजना, मुख्यमंत्री निःशुल्क जाँच योजना का दायरा सिमित करने, खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभार्थियों की संख्या कम करने, सहारिया परिवारों को मुफ्त मिल रहे अनाज तथा अन्य सुविधाओं को बंद करने, बी.पी.एल. तथा अन्त्योदय परिवारों को अनाज 1 रुपये प्रति किलो की बजाय 2 रुपये प्रति किलो करने जैसे क़दम उठा चुकी थी । राज्य में अच्छे दिन लाने के प्रयासों  की यह शुरुवात भर है।

राज्य में अच्छे दिनों को लाने के प्रयासों में महारानी के अन्य प्रयास भी अत्यंत महत्तवपूर्ण हैं । उन्होंने पहले ही केंद्र सरकार को एक पत्र लिख कर महनारेगा को कानून के बजाये एक सामान्य योजना / कार्यक्रम में बदलने का सुझाव दे डाला था, जिसे केंद्र की सरकार ने अपनी अदुर्दार्शिता में नहीं माना।

अब राजस्थान सरकार ने विधान सभा के बजट सत्र में ही रज्य में चार श्रम कानूनों में संशोधन के विधेयक पास किये हैं, जो राज्य में (शुक्र है) तभी लागु होंगे जब उन्हें राष्ट्रपति का अनुमोदन मिलेगा । ये संशोधन राज्य में  कम्पनियों को अपनी मर्ज़ी से मजदूरों को निकल बहार करने के अधिकार पर लगे रोक को कम करेंगे तथा फक्ट्रियों में मजदूरों की सुरक्षा सुवाधिओं एवं पर्यावरण सुरक्षा की बाध्यता को कम करेंगे तथा मजदूरों के यूनियन बनाने के अधिकार को कम करेंगे।

अच्छे दिनों की तरफ एक और क़दम बढ़ाते हुए राज्य सरकार ने अब एक नया भूमि अधिग्रहण कानून का मसौदा भी बनाया है, जो पिछले वर्ष भूमि अधिग्रहण पर बनाये गये केन्द्रीय कानून, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने भी पारित होने दिया था, को नज़रंदाज़ करते हुए, उद्योगों के विशेष मांग पर,  सामाजिक प्रभावों के अध्ययन तथा पुनर्वास जैसे शर्तों को समाप्त करने, भूमि अधिग्रहण के लिए प्राधिकरण बनाने तथा भूमि अधिग्रहण के लिए न कहने वालों को सजा देने के प्रावधान करता है ।

जुलाई में पेश किये गए राज्य बजट में सारा जोर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के द्वारा सड़कों का जाल फ़ैलाने और शहरीकरण करने पर दिया गया है । अच्छे दिनों की पड़ताल में निजी क्षेत्र की भागीदारी की ये क़वायद स्वाभविक रूप से राज्य में मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद् में उद्योगपतियों को शामिल करने, उनकी सुविधा के अनुसार श्रम तथा भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने तथा मुफ्त की योजनाओं को समाप्त करने की दिशा में ही जाती है ।

हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है की राजस्थान में तो अच्छे दिन आ ही चुके हैं । साथ ही केंद्रीय श्रम कानूनों तथा भूमि अधिग्रहण पर पिछले वर्ष पारित केंद्रीय कानून की अनदेखी करने की राज्य सरकार की पहल अन्य राज्यों को भी अच्छे दिन लाने की दिशा में किये जा सकने वाले प्रयासों की सीख देगा ।
16 अगस्त, 2014 के मददगार, उदयपुर में प्रकाशित 

Friday, May 9, 2014

Whither Policy Direction!!!

Published in the Hindustan Times May 8, 2014

The recently formed Bhartiya Janta Party government in Rajasthan has not very clearly articulated its policy direction yet. The state unit of BJP had presented a long election manifesto before the legislative assembly elections, but the government has hardly got any time to implement it. Soon after the formation of the government the Loksabha elections were declared, and government got enough time only to present state’s Interim Budget 2014-15 and the vote on account in March. The interim budget speech by the Chief Minister Ms. Vasundhara Raje was very short and provided no clue to the possible policy directions her government intended to take. The three priority areas identified in the budget are promotion of solar energy, providing water to the unreached villages and laying a road network of 20 thousand KM in the state. However, the budget allocation was increased only for solar energy and not for the other two. The earlier Bhamashah yojana is also to be reintroduced according to the budget speech. Under the scheme, the state government plans to deposit Rs. 1,500 in accounts of 50 lakhs rural families through biometric smart cards along with health insurance. However, the social development schemes initiated by the earlier government like free medicine and free medical tests schemes could not find mention in the budget speech. Continue reading here