Monday, December 8, 2014

Economic Growth at What Cost?

[Reflections after my Indonesia trip in October 2014, first published on http://csnbricsam.org/]


The economy must grow and fast, so that the size of the pie increases and there is a bigger share for everyone.

These were the opening remarks of the then Deputy Finance Minister of Indonesia said this (paraphrased) at the conference on “Redemocratisation of Economic, Social and Political for Inclusive Development” organized by INFID, a national network of Indonesian NGOs.

I was not quite surprised to hear that. Politicians all over the world seem to be thinking alike. They want faster and stable economic growth at any cost. We hear similar views in India. The emphasis on growth is almost universal today. The Minister also praised the Indonesian government’s policies which could achieve the sustained and continuous economic growth.

Wednesday, October 29, 2014

आर्थिक विकास बनाम पर्यावरण

डेवलपमेंट डिबेट तथा डेली न्यूज़, जयपुर में प्रकाशित...  
डेली न्यूज़, जयपुर, 29 अक्टूबर 2014

Monday, September 29, 2014

विकास का बुलडोज़र, ग़रीबों के आंसू और विकास की खुमारी में झूमता एक शहर

जेडीए की वेबसाइट पर उपलब्ध मानचित्र 
यह जयपुर नहीं पुरे हिंदुस्तान की कहानी है जो विकास की खुमार में डूबा हुआ है और विकास के बुलडोज़रों के निचे दब जाने वाले आंसुओं की परवाह किसी को नहीं है सिवाए उनके जिनके घर उजड़  रहे हैं  और खेत छिन रहे हैं I 

जयपुर में पिछले कई दिनों से रिंग रोड के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा हैI जयपुर का रिंग रोड जयपुर शहर के चारों तरफ 144.75 किलोमीटर एक 6 लेन की सड़क होगी I सड़क की चौड़ाई 90 मीटर है जबकि इस के दोनों तरफ कुल 270 मीटर जमीन पर रियल  स्टेट विकसित होगा, मॉल्स और मल्टीप्लेक्सेज बनेंगे और ऊँची बहु मंजिली इमारतें खड़ी की जाएँगी I विकास की ये सारी कवायद एक विदेशी कम्पनी करेगी I इस विकास से किसको कितना लाभ होगा कुछ स्पष्ट नहीं है I विकास की इस प्रक्रिया में कितने किसान अपनी खेती की ज़मीन खो रहे हैं, कितने ग़रीबो के आशियाने उजाड़ रहे हैं इस की कोई स्पष्ट जानकारी कहीं एक जगह उपलब्ध नहीं है I

परियोजना में अपनी ज़मीन खोने वाले किसान उच्च न्यायलय तक गुहार लगा आये कि सरकार उनसे 90 मीटर सड़क के लिए आवश्यक ज़मीन ले ले लेकिन सड़क के दोनों तरफ जो मॉल्स वगैरह के लिए ज़मीन ली जा रही है वो ना ली जाये I लेकिन विकास की खुमारी में डूबे कोर्ट ने भी उनकी नहीं सुनी और परियोजना में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया I

विडम्बना यह भी है कि रिंग रोड के लिए भूमि का अधिग्रहण चूँकि पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत किया जा रहा है इसलिए प्रभावितों और विस्थापितों को पिछले वर्ष पारित भूमि अधिग्रहण कानून का भी कोई लाभ नहीं मिलेगा I उन्हें केवल मुआवज़ा मात्र पे सब्र करना होगा I ऐसे में जिन ग़रीबों के घर अभी टूट रहे हैं वो कहाँ जायेंगेI दैनिक भास्कर के अनुसार लोग पूछ रहे हैं कि क्या सरकार उन्हें एक घर भी नहीं दे सकती!
पीड़ा भरा प्रश्न : कई ऐसे लोगों के आशियानें उजड़ रहे हैं, जिनके पास रहने को छत नहीं है। कई लोग गरीबी रेखा में हैं, उनके पास जमीनें भी नहीं हैं। मुआवजे से जगह खोजकर छत बनाना मुश्किल है। जेडीए ऐसे लोगों को अफोर्डेबल हाउसिंग योजना में मकान नहीं दे सकता क्या? दे तो मदद मिले। (दैनिक भास्कर, जयपुर सितम्बर 30)
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25 सितम्बर 2014 के दैनिक भास्कर से  
सैकड़ों नहीं हजारों पुलिस वालों की मदद से जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा परियोजना के पहले और दुसरे चरण के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में लोगों के हारे मन से किये जा रहे विरोध और उनके आंसुओं का विकास के निर्मम और कठोर बुलडोज़रों पर कोई असर नहीं है I सरकार ने शहर में बड़े बड़े होर्डिंग्स लगवा दिए हैं, जिनमें रिंग रोड परियोजना के लिए सफलता पूर्वक भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है I अखबारों में विकास का जश्न है तथा सरकार के लिए शाबाशी का भाव है I शहर नवरात्र की रोशनियों में गरबा नृत्य पर थिरक रहा है तथा 'जयपुर बाई नाईट' की खुमार डूबता उतरता है I

लेकिन अखबारों के पन्नों पर उजड़ रहे किसानों और ग़रीबों के आंसुओं की बूँद भी कहीं कहीं छलक ही पड़ती हैंI आप भी देख सकते हैं bhaskar.com से साभार ली गयीं कुछ तस्वीरें ............

विकास का बुलडोज़र और ग़रीबों के आंसू (तस्वीरें भास्कर.कॉम से साभार - लिंक यहाँ )

PICS: पहले आंखो के सामने तोड़ा आशियाना फिर खुद ही पोछ दिए आंसू

PICS: पहले आंखो के सामने तोड़ा आशियाना फिर खुद ही पोछ दिए आंसू

PICS: पहले आंखो के सामने तोड़ा आशियाना फिर खुद ही पोछ दिए आंसू



PICS: पहले आंखो के सामने तोड़ा आशियाना फिर खुद ही पोछ दिए आंसू

PICS: पहले आंखो के सामने तोड़ा आशियाना फिर खुद ही पोछ दिए आंसू


Wednesday, August 13, 2014

Rajasthan Land Acquisition Bill 2014: Taking Away People's Right



Published in the Hindustan Times August 14, 2014 Jaipur edition

A longer version of this article is available on: http://www.developmentdebate.in/2014/08/rajasthan-land-acquisition-bill-2014.html


Monday, August 11, 2014

राजस्थान के अच्छे दिन

राजस्थान की जनता बड़ी दूरदर्शी है। उनहोंने केंद्र में नयी सरकार आने के छह माह पूर्व ही अच्छे दिनों की पदचाप सुन ली थी  और इसीलिए राज्य में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत दे कर सत्ता में लायी। भारतीय जनता पार्टी ने जैसा कि पहले से तय था, महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया जी को मुख्यमंत्री बनाया।

महारानी ने सत्ता सँभालते ही सबसे पहले ये किया कि राज्य आयोजना समिति (स्टेट पलानिंग बोर्ड) का पुनर्गठन किया तथा इस बोर्ड में देश के बड़े बड़े उद्योगपतियों, दिल्ली के एक अर्थशास्त्री, बंगलुरु के गवर्नेंस एक्सपर्ट्स और राज्य के कुछ भूतपूर्व तथा वर्तमान बड़े अधिकारीयों को रखा ।

परन्तु तुरंत ही महारानी मतलब मुख्यमंत्री महोदया को यह राज्य आयोजना समिति नाकाफी लगी और उनहोंने उसे भंग कर एक मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद् (पूर्व केंद्र सरकार से कुछ तो सिखना चाहिए ना) का गठन किया जिसमें पूर्व की आयोजना समिति के अधिकांश सदस्यों के अलावा विदेश में पढ़ा रहे एक भारतीय अर्थशास्त्री, जिनका नाम देश के प्रधान मंत्री के आर्थिक सलाहकार के संभावितों में भी चला था, को शामिल किया। अपनी पहली ही बैठक में  इस सलाहकार परिषद् ने महारानी को ये सलाह दे डाली कि अगर राज्य में अच्छे दिन लाने हैं तो सरकार जनता को कुछ भी मुफ्त ना बाँटे ।

परन्तु राज्य की सरकार को इस सलाह का इंतज़ार कब था । सरकार ने तो अच्छे दिनों के प्रयास पहले ही आरंभ कर दिए थे। सरकार ने जुलाई में पेश किये बजट में और उसके बाद से ही मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा योजना, मुख्यमंत्री निःशुल्क जाँच योजना का दायरा सिमित करने, खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभार्थियों की संख्या कम करने, सहारिया परिवारों को मुफ्त मिल रहे अनाज तथा अन्य सुविधाओं को बंद करने, बी.पी.एल. तथा अन्त्योदय परिवारों को अनाज 1 रुपये प्रति किलो की बजाय 2 रुपये प्रति किलो करने जैसे क़दम उठा चुकी थी । राज्य में अच्छे दिन लाने के प्रयासों  की यह शुरुवात भर है।

राज्य में अच्छे दिनों को लाने के प्रयासों में महारानी के अन्य प्रयास भी अत्यंत महत्तवपूर्ण हैं । उन्होंने पहले ही केंद्र सरकार को एक पत्र लिख कर महनारेगा को कानून के बजाये एक सामान्य योजना / कार्यक्रम में बदलने का सुझाव दे डाला था, जिसे केंद्र की सरकार ने अपनी अदुर्दार्शिता में नहीं माना।

अब राजस्थान सरकार ने विधान सभा के बजट सत्र में ही रज्य में चार श्रम कानूनों में संशोधन के विधेयक पास किये हैं, जो राज्य में (शुक्र है) तभी लागु होंगे जब उन्हें राष्ट्रपति का अनुमोदन मिलेगा । ये संशोधन राज्य में  कम्पनियों को अपनी मर्ज़ी से मजदूरों को निकल बहार करने के अधिकार पर लगे रोक को कम करेंगे तथा फक्ट्रियों में मजदूरों की सुरक्षा सुवाधिओं एवं पर्यावरण सुरक्षा की बाध्यता को कम करेंगे तथा मजदूरों के यूनियन बनाने के अधिकार को कम करेंगे।

अच्छे दिनों की तरफ एक और क़दम बढ़ाते हुए राज्य सरकार ने अब एक नया भूमि अधिग्रहण कानून का मसौदा भी बनाया है, जो पिछले वर्ष भूमि अधिग्रहण पर बनाये गये केन्द्रीय कानून, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने भी पारित होने दिया था, को नज़रंदाज़ करते हुए, उद्योगों के विशेष मांग पर,  सामाजिक प्रभावों के अध्ययन तथा पुनर्वास जैसे शर्तों को समाप्त करने, भूमि अधिग्रहण के लिए प्राधिकरण बनाने तथा भूमि अधिग्रहण के लिए न कहने वालों को सजा देने के प्रावधान करता है ।

जुलाई में पेश किये गए राज्य बजट में सारा जोर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के द्वारा सड़कों का जाल फ़ैलाने और शहरीकरण करने पर दिया गया है । अच्छे दिनों की पड़ताल में निजी क्षेत्र की भागीदारी की ये क़वायद स्वाभविक रूप से राज्य में मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद् में उद्योगपतियों को शामिल करने, उनकी सुविधा के अनुसार श्रम तथा भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने तथा मुफ्त की योजनाओं को समाप्त करने की दिशा में ही जाती है ।

हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है की राजस्थान में तो अच्छे दिन आ ही चुके हैं । साथ ही केंद्रीय श्रम कानूनों तथा भूमि अधिग्रहण पर पिछले वर्ष पारित केंद्रीय कानून की अनदेखी करने की राज्य सरकार की पहल अन्य राज्यों को भी अच्छे दिन लाने की दिशा में किये जा सकने वाले प्रयासों की सीख देगा ।
16 अगस्त, 2014 के मददगार, उदयपुर में प्रकाशित